फर्जी शिक्षिका की आईडी बनाकर सरकारी राशि के भुगतान का आरोप; पहले प्राथमिकी दर्ज कराने वाले DPO शशि चंदन चौधरी की भूमिका भी जांच के घेरे में, डिजिटल हस्ताक्षर और भुगतान प्रक्रिया खंगाल रही पुलिस।
Bhagalpur News: भागलपुर के शिक्षा विभाग में करीब 98 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने के बाद पुलिस की जांच तेज हो गई है। मामले में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) शशि चंदन चौधरी और संविदा ऑपरेटर अविनाश राज से पूछताछ की जा रही है। आरोप है कि फर्जी शिक्षिका की आईडी तैयार कर सरकारी राशि का भुगतान किया गया। इस मामले ने शिक्षा विभाग की भुगतान व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फर्जी शिक्षिका की आईडी से भुगतान का आरोप
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले में कथित तौर पर फर्जी शिक्षिका की आईडी बनाकर सरकारी धनराशि का भुगतान किए जाने की आशंका है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित आईडी किसने बनाई, भुगतान की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई और इस कथित वित्तीय अनियमितता में किन-किन लोगों की भूमिका रही।
करीब 92 लाख रुपये की राशि से जुड़े इस मामले की जांच में पुलिस वित्तीय लेन-देन और विभागीय प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं को खंगाल रही है। जांच का मुख्य उद्देश्य भुगतान से संबंधित दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ना है।
पहले DPO ने दर्ज कराई थी प्राथमिकी
इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि शुरुआत में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी स्थापना शशि चंदन चौधरी ने ही संविदा ऑपरेटर अविनाश राज समेत अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
हालांकि, जांच आगे बढ़ने के साथ सरकारी राशि के भुगतान की प्रक्रिया में DPO की भूमिका से जुड़े बिंदु भी जांच के दायरे में आ गए हैं। इसी सिलसिले में DPO और संविदा ऑपरेटर से पूछताछ की जा रही है।
पुलिस यह स्पष्ट करने का प्रयास कर रही है कि भुगतान की प्रक्रिया में किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जिम्मेदारी क्या थी।
डिजिटल हस्ताक्षर और अंतिम अनुमोदन की जांच
जांच के दौरान सरकारी राशि के भुगतान के अंतिम अनुमोदन और डिजिटल हस्ताक्षर से जुड़े पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि भुगतान को किसने मंजूरी दी, डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किस प्रकार हुआ और भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
इसके साथ ही कथित फर्जी आईडी तैयार करने से लेकर सरकारी राशि जारी होने तक की पूरी प्रक्रिया की जांच की जा रही है। जांच में सामने आने वाले दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल
करीब 98 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता ने शिक्षा विभाग की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में फर्जी आईडी के माध्यम से भुगतान की पुष्टि होती है, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि विभागीय स्तर पर इस अनियमितता को समय रहते क्यों नहीं रोका जा सका।
सरकारी राशि के भुगतान में पारदर्शिता, सत्यापन और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था की प्रभावशीलता भी इस मामले में जांच का महत्वपूर्ण पहलू है।
जांच के बाद स्पष्ट होगी पूरी तस्वीर
फिलहाल पुलिस दोनों से पूछताछ कर मामले की विभिन्न कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। जांच के आधार पर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है कि कथित वित्तीय अनियमितता कैसे हुई और इसमें किन लोगों की क्या भूमिका रही।
हालांकि, मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और उपलब्ध साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल किसी भी व्यक्ति की भूमिका या दोष को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अब सबकी नजर पुलिस की जांच पर है। करीब 98 लाख रुपये की इस कथित वित्तीय अनियमितता में सरकारी राशि के भुगतान की पूरी प्रक्रिया और जिम्मेदार लोगों की भूमिका सामने आने के बाद ही मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।


