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बिहार को कुपोषण मुक्त बनाने की बड़ी मुहिम: 23 अप्रैल तक चलेगा ‘पोषण पखवाड़ा’, 85% मस्तिष्क विकास पर फोकस

बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करने और पिता की भागीदारी पर विशेष जोर; राज्य भर में 64 लाख से अधिक गतिविधियां दर्ज

Patna News: बिहार को कुपोषण की बेड़ियों से मुक्त करने और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए समाज कल्याण विभाग द्वारा आयोजित 8वां पोषण पखवाड़ा 2026 अपने अंतिम चरण में है। 9 अप्रैल से शुरू हुआ यह अभियान 23 अप्रैल तक राज्य के सभी 38 जिलों में व्यापक स्तर पर चलाया जा रहा है। इस वर्ष का मुख्य संदेश है— “जीवन के पहले छह वर्षों में मस्तिष्क विकास को अधिकतम करना।”

मस्तिष्क विकास के लिए ‘प्रारंभिक उत्प्रेरण’ है जरूरी

​विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे के मस्तिष्क का लगभग 85 प्रतिशत विकास 6 वर्ष की आयु तक हो जाता है। इसमें भी जीवन के पहले 1000 दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए, इस बार अभियान का फोकस 0-3 वर्ष के बच्चों के लिए ‘प्रारंभिक उत्प्रेरण’ और 3-6 वर्ष के बच्चों के लिए ‘खेल-आधारित शिक्षा’ पर रखा गया है।

अब केवल मां नहीं, पिता भी संभालेंगे जिम्मेदारी

​इस वर्ष के पोषण पखवाड़ा की सबसे बड़ी विशेषता पुरुषों (पिताओं) की सक्रिय भागीदारी है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर विशेष सत्र आयोजित कर पिताओं को यह सिखाया जा रहा है कि बाल पोषण केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक साझा पारिवारिक दायित्व है।

  • स्क्रीन टाइम पर लगाम: अभिभावकों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे बच्चों को मोबाइल/टीवी से दूर रखकर उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं।
  • देखभाल में भूमिका: गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के खान-पान का ध्यान रखने के लिए पिताओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

आंगनबाड़ी केंद्रों पर मिल रहा है पौष्टिक आहार

​अभियान के तहत बच्चों के पोषण के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं:

  • 0-3 वर्ष के बच्चे: इन्हें ‘टेक-होम राशन’ के रूप में चावल, दाल और सोयाबड़ी दी जा रही है।
  • 3-6 वर्ष के बच्चे: इन्हें केंद्रों पर ही गर्म पका हुआ भोजन जैसे खिचड़ी और पुलाव दिया जा रहा है, जो प्रोटीन और विटामिन से भरपूर है।
  • स्वास्थ्य जांच: सैम (SAM) और मैम (MAM) स्क्रीनिंग के जरिए कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें ‘पोषण पुनर्वास केंद्र’ भेजा जा रहा है।

जन आंदोलन का रूप ले रहा अभियान

​समाज कल्याण विभाग की सचिव और आईसीडीएस निदेशक के नेतृत्व में इस अभियान ने एक ‘जन आंदोलन’ का रूप ले लिया है। अब तक राज्यभर में 64 लाख 91 हजार 371 गतिविधियां दर्ज की गई हैं, जिनमें पोषण पंचायत, स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता रैलियां शामिल हैं।

​बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक, पोषण पखवाड़ा कुपोषण, स्टंटिंग और एनीमिया जैसी चुनौतियों के खिलाफ एक मजबूत ढाल बनकर उभरा है। विभाग का लक्ष्य आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल भोजन वितरण केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास का सशक्त माध्यम बनाना है।

विजय सिन्हा
विजय सिन्हाhttp://silktvnews.com
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