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बांकीपुर उपचुनाव: नितिन नबीन के बाद कौन? BJP के लिए ‘साख’ की सीट पर कायस्थ बनाम सवर्ण का पेंच; हरेंद्र सिंह की चर्चा तेज

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई पटना की सबसे हॉट सीट।

Patna News: बिहार की राजनीति में इस समय राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन चुकी है। इस सीट से विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रहे नितिन नबीन को भाजपा आलाकमान द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष की बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने के बाद, उनके इस्तीफे से यहाँ उपचुनाव की सरगर्मी चरम पर है। यह सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि भाजपा के लिए अपनी ‘साख’ और ‘परंपरा’ को बचाने की लड़ाई है। जहां एक तरफ विपक्ष इस किले को ढहाने की ताक में है, वहीं बीजेपी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा संकट एक ऐसे चेहरे को उतारने का है जो सामाजिक और सांगठनिक दोनों कसौटियों पर खरा उतरे।

कायस्थों का पुराना गढ़, लेकिन सवर्ण प्रतिनिधित्व पर उठे सवाल

​बांकीपुर सीट पारंपरिक रूप से कायस्थ मतदाताओं के प्रभाव वाली सीट मानी जाती रही है। दिवंगत नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से लेकर उनके पुत्र नितिन नबीन तक, दशकों से इस सीट पर कायस्थ समाज का नेतृत्व रहा है। लेकिन इस बार उपचुनाव के समीकरण थोड़े बदले हुए हैं।

​राजनीतिक गलियारों और खुद बीजेपी के भीतर यह चर्चा तेज है कि वर्तमान समय में राजधानी पटना की किसी भी सीट पर कोई सवर्ण (राजपूत/भूमिहार/ब्राह्मण) विधायक नहीं है। चूंकि सवर्ण मतदाता भाजपा के कोर और पारंपरिक वोटर रहे हैं, ऐसे में पार्टी के भीतर से ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या राजधानी को सवर्ण नेतृत्व से पूरी तरह खाली रखा जाएगा? यही वजह है कि इस बार कायस्थ समाज के दावों के बीच गैर-कायस्थ सवर्ण चेहरों की दावेदारी भी बेहद मजबूत होकर उभरी है।

रेस से मयूख बाहर, ऋतुराज सिन्हा और रणवीर नंदन के नामों पर मंथन

​टिकट वितरण को लेकर चल रहे गुणा-भाग में कई बड़े उलटफेर देखने को मिल रहे हैं:

  • संजय मयूख: कुछ समय पहले तक भाजपा के मुख्य प्रवक्ता संजय मयूख को इस सीट का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था। लेकिन पार्टी द्वारा उन्हें विधान परिषद (MLC) भेजे जाने के बाद अब उनकी दावेदारी समाप्त मानी जा रही है।
  • ऋतुराज सिन्हा: राष्ट्रीय राजनीति और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले ऋतुराज सिन्हा को भाजपा के युवा, आधुनिक और कॉर्पोरेट विंग के चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। अगर पार्टी भविष्य के नेतृत्व और युवाओं पर दांव लगाना चाहेगी, तो इनका पलड़ा भारी हो सकता है।
  • प्रो. रणवीर नंदन: बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर रणवीर नंदन अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सामाजिक छवि के कारण एक गंभीर और परिपक्व विकल्प के रूप में रेस में बने हुए हैं।

अंदरखाने हरेंद्र सिंह के नाम की भारी गूंज, नवीन सिन्हा के रहे हैं ‘सारथी’

​इन तमाम चेहरों के बीच, कायस्थ समाज से बाहर सवर्ण (राजपूत) समाज से आने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व पटना महानगर अध्यक्ष हरेंद्र सिंह का नाम अचानक तेजी से उभरा है। हरेंद्र सिंह सिर्फ संगठन के पुराने और समर्पित सिपाही ही नहीं हैं, बल्कि उनका बांकीपुर सीट से बेहद गहरा और भावनात्मक जुड़ाव रहा है।

​वे नितिन नबीन के पिता और भाजपा के दिग्गज नेता दिवंगत नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि नवीन सिन्हा के पूरे चुनाव का कुशल मैनेजमेंट हरेंद्र सिंह ही संभालते थे। क्षेत्र की जनता, सांगठनिक ढांचे और जमीनी समीकरणों पर उनकी पकड़ बेजोड़ है। ऐसे में संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और चुनावी गणित उन्हें इस रेस में सबसे आगे खड़ा कर रहा है।

बीजेपी आलाकमान के लिए आसान नहीं होगा फैसला

​बांकीपुर का यह उपचुनाव केवल एक सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की भविष्य की राजनीतिक दिशा, सामाजिक संतुलन और सांगठनिक प्राथमिकताओं का लिटमस टेस्ट है। पार्टी के सामने एक तरफ दशकों पुरानी कायस्थ परंपरा को अक्षुण्ण रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अपने कोर सवर्ण वोटबैंक को संतुष्ट करने का दबाव। अब देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी नेतृत्व ऋतुराज सिन्हा जैसे युवा चेहरे पर दांव लगाता है, रणवीर नंदन की सामाजिक छवि को चुनता है, या फिर हरेंद्र सिंह जैसे जमीनी और अनुभवी संगठनकर्ता को मौका देकर नया राजनीतिक समीकरण साधता है।

विजय सिन्हा
विजय सिन्हाhttp://silktvnews.com
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