Bhagalpur News: तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) में अतिथि शिक्षकों का आक्रोश अब चरम पर पहुंच गया है। प्रभारी कुलपति डॉ. बी.एस. झा द्वारा गठित की गई कमेटी और उसकी जांच रिपोर्ट के खिलाफ अतिथि शिक्षकों का अनिश्चितकालीन धरना आज लगातार पांचवें दिन भी जारी रहा। शिक्षकों का आरोप है कि इस अवैध कमेटी ने गलत और भ्रामक जांच रिपोर्ट भेजकर राजभवन को गुमराह करने का काम किया है।
अपनी मांगों के समर्थन में और विश्वविद्यालय प्रशासन के रवैये के खिलाफ आज ठीक साढ़े बारह बजे सभी आंदोलनकारी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने एक अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
जब गूंज उठी थालियों की आवाज: वायरस रूपी भ्रष्टाचार को भगाने का अनोखा तरीका
विश्वविद्यालय परिसर आज दोपहर ठीक 12:30 बजे थालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सभी प्रदर्शनकारी शिक्षक और शिक्षिकाएं हाथों में थाली लेकर उसे पीटते हुए विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर जमा हो गए।
अतिथि शिक्षकों ने इस अनोखे प्रदर्शन की वजह बताते हुए कहा:
”वर्तमान में तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय संक्रमण के बेहद बुरे दौर से गुजर रहा है। थाली और ताली बजाने की यह क्रिया विश्वविद्यालय में फैले ‘वायरस रूपी जांच कमेटी’ और भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त उच्चाधिकारियों से टीएमबीयू को बचाने का एक प्रतीक है। इसके साथ ही यह आवाज गहरे अहंकार के मद में डूबे हुए मदांध कुलपति और कुलसचिव को नींद से जगाने के लिए भी है।”
शिक्षकों ने साफ किया कि जब तक उनकी तीन मुख्य मांगें—11 महीने का बकाया मानदेय जारी करना, नई निष्पक्ष जांच कमेटी का गठन और वर्तमान व पूर्व की दोनों जांच रिपोर्टों को सार्वजनिक करना—पूरी नहीं होतीं, आंदोलन थमेगा नहीं।
रजिस्ट्रार का लाचार बयान: “वीसी जो कहते हैं, मैं सिर्फ वही करता हूँ”
थालियां पीटते हुए जब आक्रोशित शिक्षक सीधे कुलसचिव (रजिस्ट्रार) से मिलने पहुंचे और उनसे जवाब मांगा, तो विश्वविद्यालय प्रशासन की लाचारी और आंतरिक खींचतान खुलकर सामने आ गई। रजिस्ट्रार ने शिक्षकों के सामने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के किसी भी कार्य पर उनका कोई वश नहीं है। कुलपति जो भी आदेश देते हैं, वह सिर्फ उसी का पालन करते हैं। रजिस्ट्रार के इस बयान ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डॉ. योगेंद्र का फेसबुक पर जोरदार हमला: धांधली करने वाले अधिकारी जेल क्यों नहीं गए?
अतिथि शिक्षकों के इस आंदोलन को अब समाज और शिक्षाविदों का भी बड़ा समर्थन मिल रहा है। हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, पूर्व डीएसडब्ल्यू (DSW) और प्रखर सामाजिक आंदोलनों से जुड़े डॉ. योगेंद्र ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए विश्वविद्यालय प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है।
डॉ. योगेंद्र ने तीखे सवाल उठाते हुए लिखा:
”सबसे बड़ा सवाल यह है कि धांधली किसने की? क्या नियुक्त हुए शिक्षक ने धांधली की या फिर जिसने उन्हें नियुक्त किया था? चयन बोर्ड (सिंडिकेट/कमेटी) में आवेदनकर्ता खुद सदस्य नहीं होते हैं। आवेदनकर्ता की जिम्मेदारी सिर्फ अपने प्रमाण पत्रों को लेकर होती है। अगर किसी ने गलत प्रमाण पत्र दिया है तो बेशक उसे सजा दो। वरना, जिसने नियम ताक पर रखकर नियुक्ति की है, उस अधिकारी पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज करो, जांच कराओ और उसे जेल भेजो। दोषी को सजा नहीं और निर्दोषों को फांसी! यह कहां का नियम है?”
आंदोलनकारियों की 3 प्रमुख मांगें:
- मानदेय का भुगतान: पिछले 11 महीनों से रुका हुआ बकाया मानदेय तुरंत जारी किया जाए।
- पारदर्शिता: वर्तमान और पूर्व में तैयार की गई दोनों जांच रिपोर्टों को अविलंब सार्वजनिक किया जाए।
- निष्पक्षता: पुरानी पूर्वाग्रह से ग्रसित कमेटी को रद्द कर एक नई और निष्पक्ष जांच कमेटी का गठन हो।
शिक्षकों के इस तीखे तेवर और रजिस्ट्रार की लाचारी ने साफ कर दिया है कि टीएमबीयू के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। अब देखना यह है कि राजभवन को गुमराह करने के आरोपों के बीच घिरे प्रभारी कुलपति इस गतिरोध को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाते हैं या फिर विश्वविद्यालय में पढ़ाई-लिखाई का माहौल ऐसे ही पटरी से उतरा रहेगा।


