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भागलपुर में “समवेत” की हुंकार: “जब आवाज उठाएंगे” नाटक के जरिए महिला हिंसा और सामाजिक चुप्पी पर करारा प्रहार

राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस पर ईडेन फ्लोरा एकेडमी में मंचन; पुरुषवादी मानसिकता और पीड़ित को दोषी ठहराने वाली रूढ़ियों को दी गई चुनौती

Bhagalpur News: “बा अदब बा मुलाहिजा होशियार, हमारी जो बात सुने वह अकलमंद, बाकी सब बेकार…” इन दमदार संवादों के साथ भागलपुर के खीरी बांध स्थित ईडेन फ्लोरा एकेडमी के परिसर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘समवेत’ ने अपनी सशक्त नाट्य प्रस्तुति “जब आवाज उठाएंगे” का मंचन किया। राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया और महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए पर आत्म-मंथन के लिए मजबूर किया।

देह से ऊपर ‘इंसान’ मानने की जद्दोजहद

​नाटक की मूल संवेदना महिलाओं के प्रति बढ़ती यौन हिंसा और समाज की संवेदनहीनता पर केंद्रित थी। प्रस्तुति में यह बखूबी दिखाया गया कि आज भी पितृसत्तात्मक समाज औरत को एक ‘चेतनाशील मनुष्य’ के बजाय मात्र एक ‘वस्तु’ या ‘आनंद का साधन’ समझता है। नाटक ने इस विडंबना को उजागर किया कि अपराध होने पर अपराधी के बजाय पीड़ित पर ही पाबंदियां थोपी जाती हैं और समाज अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं के चलते पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा कर देता है।

आवाज उठाना ही बदलाव की पहली सीढ़ी

​कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से यह कड़ा संदेश दिया कि जब तक समाज छोटी-छोटी घटनाओं पर चुप्पी नहीं तोड़ेगा, तब तक बड़े बदलाव की उम्मीद बेमानी है। मंच से यह आह्वान किया गया कि स्थितियां तभी बदलेंगी जब हम हर उस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे जिसे समाज अक्सर दबा देता है।

मंच के सितारे और टीम

​नाटक का निर्देशन विक्रम कांत ने किया, जबकि सह-निर्देशन कुमार आनंद का रहा। कलाकारों ने अपनी ऊर्जा और संवाद अदायगी से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा:

  • सूत्रधार: वंदना
  • रिपोर्टर: ज्योति, काजल और अंशु
  • प्रमुख भूमिकाएं: छोटी (पुरुष), करिश्मा (महिला), सुहानी (प्रतिवादी), अंकिता (लड़का)
  • सहयोगी कलाकार: ब्यूटी, आंचल, वैष्णवी और मोनी

विशेषज्ञों की राय: रंगमंच से सामाजिक क्रांति

​कार्यक्रम के दौरान कई प्रबुद्ध हस्तियों ने अपने विचार साझा किए:

  • मोहम्मद शाहीन अनीस (समवेत): उन्होंने रंगमंच की ‘नई पौध’ तैयार करने की जरूरत पर बल दिया।
  • सुश्री छाया पांडे (अध्यक्ष, समवेत): “नाटक सांस्कृतिक हस्तक्षेप और सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त माध्यम है।”
  • डॉ. मनोज मीता (गांधीवादी विचारक): उन्होंने हाशिए के समुदाय की लड़कियों के मंच पर आने को एक ‘क्रांति की शुरुआत’ बताया।
  • डॉ. सुनील कुमार साह (सचिव, समवेत): उन्होंने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया और भविष्य में ऐसे आयोजनों को निरंतर जारी रखने की बात कही।

​इस अवसर पर मनीष कुमार, शुफीया, निशा, रोहन, कुमारी अर्चना और राहुल सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन वर्षा ने किया।

विजय सिन्हा
विजय सिन्हाhttp://silktvnews.com
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