
भागलपुर। नववर्ष की सुबह मानवता और सामाजिक सरोकार की एक प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है। शरन्य राष्ट्रीय मानवाधिकार के समय पर किए गए हस्तक्षेप से वर्षों से टूटने की कगार पर खड़ा एक परिवार फिर से एकजुट होने की राह पर लौट आया। यह मामला न केवल एक परिवार के पुनर्मिलन का है, बल्कि समाज में संवाद, समझ और संवेदनशीलता की अहमियत को भी रेखांकित करता है।
जानकारी के अनुसार, पति-पत्नी के बीच बीते तीन-चार वर्षों से लगातार विवाद, झगड़ा, गाली-गलौज और आपसी अविश्वास का माहौल बना हुआ था। हालात इतने बिगड़ चुके थे कि दोनों पक्षों के परिजन थाना और न्यायालय में एक-दूसरे के खिलाफ आवेदन दे रहे थे। एक नन्हा बच्चा भी इस पारिवारिक कलह का मूक गवाह बन रहा था। अंततः स्थिति यहां तक पहुंच गई कि दंपती एक-दूसरे के साथ रहने को तैयार नहीं थे।
मामला जब शरन्य राष्ट्रीय मानवाधिकार के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. ईशान सिन्हा के संज्ञान में आया तो उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए भागलपुर विश्वविद्यालय थाना प्रभारी अविनाश कुमार से मुलाकात की। पूरे प्रकरण की बारीकी से जानकारी ली गई और तथ्यों की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि विवाद की जड़ बड़ी नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों से उपजी गलतफहमियां थीं।
इसके बाद थाना प्रभारी के नेतृत्व में मानवाधिकार टीम ने साहिबगंज स्थित लड़के के आवास पर जाकर दोनों पक्षों से संवाद किया। बिना किसी दबाव के समझाइश के बाद पति-पत्नी तीन माह के लिए साथ रहने पर सहमत हुए। इस सहमति को लिखित समझौता पत्र के रूप में विश्वविद्यालय थाना में जमा कराया गया है।
इस मानवीय पहल में जिला अध्यक्ष प्रेम शंकर तिवारी, सचिव सुबोध शर्मा, मीडिया प्रभारी मनीष राम, पारिवारिक सलाहकार एडवोकेट राजेश कुमार जायसवाल, पटना हाईकोर्ट के एडवोकेट रवीश कुमार, प्रदेश अध्यक्ष कुणाल सिंह की सक्रिय भूमिका रही। वहीं, भागलपुर विश्वविद्यालय थाना प्रभारी और उनकी टीम का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने संवेदनशीलता के साथ परिवार को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।




